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लाल किताब में ग्रहों के प्रभाव और उपाय

लाल किताब लाल किताब ज्‍योतिष की महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकों में से एक है। आसान उपायों के कारण यह जन-साधारण में हाल के वर्षों में बहुत प्रसिद्ध हुई है। अभी तक लाल किताब इण्‍टरनेट पर हिन्‍दी में उपलब्‍ध नहीं थी अत: लाल किताब प्रेमियों को परेशानी का सामना करना पडता था। हमारी साइट के प्रयोक्‍ताओं की इसी मांग को ध्‍यान में रखकर हम लाल किताब हिन्‍दी में उपलब्‍ध करा रहे हैं और आशा है कि लाल किताब प्रेमी लाभान्वित होंगे।

लाल किताब क्या है ?

लाल किताब में ग्रहों के प्रभाव और उपाय लाल किताब ज्योतिष की एक ऐसी पुस्तक है जिसमें वैदिक ज्योतिष से कुछ अलग तरीके से फल-कथन दिया गया है। यह संस्कृत के श्लोकों में ना होकर उर्दू के शब्दों में मुख्य रूप से बनाई गई है। इसमें वैदिक ज्योतिष की तरह अलग-अलग भाव के स्वामी ग्रह ना बताकर प्रत्येक भाव का एक स्थाई स्वामी ग्रह माना जाता है और उसी के आधार पर ज्योतिषीय गणना की जाती है।

इसमें प्रथम भाव को मेष राशि, दूसरे भाव को वृषभ राशि और इसी प्रकार 12 भावों को व्यवस्थित किया गया है और प्रत्येक घर का एक ग्रह का निश्चित स्थान कारकत्व प्रदान किया गया है उसी के आधार पर फल की गणना की जाती है। लाल किताब की विशेषता यह है कि इसमें ऐसे उपाय दिए गए हैं जो टोने और टोटके के रूप में बहुत ही आसान हैं और एक सामान्य व्यक्ति इन उपायों को कर ग्रह दोषों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

लाल किताब की पृष्ठभूमि

भारतवर्ष की पृष्ठभूमि प्राचीन काल से ज्ञानवान रही है। यहां विभिन्न प्रकार के ऋषि मुनियों ने जन्म लिया है, जिन्होंने विभिन्न प्रकार की स्मृतियां, पुराण, ग्रंथ आदि की रचना की है। लाल किताब भी ज्योतिष की एक ज्योतिष का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। यह विद्या भारत के उत्तरांचल और हिमाचल क्षेत्र से हिमालय के इलाकों में फैली और बाद में इसका प्रचलन मैदानी क्षेत्रों में पंजाब आदि से होकर अफगानिस्तान तक होता रहा।

भारतीय वैदिक सभ्यता में कंठस्थ करने की आदत डाली जाती थी इसलिए इस प्रकार की समस्त विद्याएं एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को कंठस्थ रूप से अग्रेषित की जाती थी। कुछ लोगों का मानना है की एक समय आकाश से आकाशवाणी भी होती थी जिससे किसी भी शुभ-अशुभ के घटित होने की सूचना प्राप्त होती थी इसी प्रकार इस ग्रंथ को एक पीढ़ी के लोगों ने लिपिबद्ध किया और तब धीरे-धीरे यह एक महान ग्रंथ बनने की ओर अग्रसर हुआ। वर्ष 1939 में जालंधर शहर पंजाब के निवासी पंडित रूप चंद जोशी ने इसको लिखा और तब से उनके नाम का संबंध लाल किताब से जोड़कर देखा जाता है।

पंडित रूप चंद जोशी ने इस किताब को लगभग 5 भागों में लिखा है अर्थात इस पुस्तक के पाँच संस्करण हैं जो कि निम्नलिखित हैं:-

1. लाल किताब के फरमान: यह पुस्तक वर्ष 1939 में प्रकाशित हुई।

2. लाल किताब के अरमान: यह पुस्तक वर्ष 1940 में प्रकाशित हुई।

3. लाल किताब (गुटका): यह पुस्तक वर्ष 1941 में प्रकाशित हुई।

4. लाल किताब: यह पुस्तक वर्ष 1942 में प्रकाशित हुई।

5 लाल किताब: यह पुस्तक वर्ष 1952 में प्रकाशित हुई।

यह सभी पांचों भाग अपने आप में पूर्ण रूप से संपूर्णता ग्रहण किए हुए हैं। इस पद्धति के नियम अन्य ज्योतिष पद्धतियों से कुछ भिन्नता लिए हुए हैं। यही इस किताब को एक महान ग्रंथ बनाते हैं। जिस कालखंड में इस पुस्तक की रचना हुई उस समय मुख्य रूप से उर्दू प्रचलन में थी। इस कारण पंडित रूप चंद जोशी ने इसकी रचना उर्दू में की ताकि आम बोलचाल में लोग इसको आसानी से समझ सकें और छोटे-छोटे उपाय द्वारा अपने जीवन की समस्याओं का निवारण कर सकें। लाल किताब का उर्दू भाषा से संबंध होने के कारण कुछ लोगों में भ्रांतियाँ भी हैं कि यह फारसी अथवा अरबी ग्रंथ है जो कि सर्वथा ग़लत है।

लाल किताब के सूत्रों का संबंध फलित ज्योतिष आम ज्योतिष की प्रसिद्ध धारणा से नहीं होकर विशेष रूप से सामुद्रिक, नाड़ी शास्त्र और हस्तरेखा जैसे विद्याओं से संबंधित है। इस पुस्तक का संबंध वास्तु-शास्त्र से भी माना जाता है। वास्तव में यह एक अनूठी पुस्तक है जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति उन छोटे-छोटे उपायों, टोटकों आदि के बारे में जानकर उन्हें प्रयोग कर सकता है और ग्रह दोषों से मुक्ति प्राप्त कर ग्रहों को अनुकूल बनाने का प्रयास कर सकता है।

लाल किताब की विशेषताएं

लाल किताब ज्योतिष के संबंध में एक बहुत ही आसान पुस्तक है जिसके द्वारा कोई सामान्य व्यक्ति भी अपने चारों ओर की परिस्थितियों के अनुसार अपनी जन्म कुंडली को परख सकता है और आसान उपाय करके ग्रहों को अनुकूल बना सकता है। इसके नियम वैदिक ज्योतिष के नियमों से भिन्न हैं। जैसे- वैदिक ज्योतिष में लग्न को सर्वाधिक मान्यता दी जाती है और जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदित राशि को लग्न भाव में अर्थात प्रथम भाव में लिखा जाता है। लेकिन लाल किताब कुंडली में ऐसा नहीं होता है। इसमें कुंडली में भाव स्थिर ही रहते हैं जैसे कि कालपुरुष की कुंडली में।

उदाहरण के लिए यदि किसी का जन्म वैदिक ज्योतिष के अनुसार धनु लग्न में हुआ है तो उसकी जन्म कुंडली में धनु राशि प्रथम अर्थात लग्न भाव में लिखी जाएगी, लेकिन लाल किताब में ऐसा नहीं होगा। लाल किताब के अनुसार, कुंडली में प्रथम भाव अर्थात लग्न में मेष राशि ही लिखी जाएगी और धनु राशि उसी क्रमानुसार नवम भाव में अंकित की जाएगी।

इसी प्रकार ग्रहों की भी स्थिति है। यदि वैदिक ज्योतिष की कुंडली में गुरु बृहस्पति उच्च का है तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि गुरु बृहस्पति कर्क राशि में स्थित है भले ही वह किसी भी भाव में स्थित हो परंतु लाल किताब कुंडली में गुरु कर्क राशि में चौथे भाव में ही माना जाएगा और उसी के अनुसार उसका फल कथन किया जाता है।

इसके अतिरिक्त ग्रहों भावों और लाल किताब कुंडली जिसे टेवा भी कहते हैं, के बारे में भी अपना अलग मत है। इसके अनुसार पक्का घर, सोया हुआ ग्रह, सोया हुआ भाव या घर, साथी ग्रह, रतान्ध्र ग्रह या अंधा टेवा, धर्मी टेवा तथा नाबालिक टेवा जैसे शब्दों का प्रयोग भी किया जाता है, जिनका लाल किताब के अनुसार बहुत महत्व है। आइए इन शब्दों को और विस्तार से जानते हैं:

पक्का घर

वैदिक ज्योतिष में जहां प्रत्येक भाव के कारक ग्रह निश्चित होते हैं लाल किताब कुंडली में ऐसा नहीं होता। यहां कालपुरुष कुंडली की भांति प्रथम भाव में मेष राशि स्थित होती है और इस प्रकार वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर और कुंभ तथा अंतिम बारहवें भाव में मीन राशि अंकित की जाती है। अब क्योंकि मेष राशि का स्वामी मंगल है अतः मंगल का पक्का घर प्रथम भाव माना जाएगा। चतुर्थ भाव में कर्क राशि होने से चंद्रमा का पक्का घर माना जाएगा। इसी प्रकार नवम भाव बृहस्पति तथा दशम और एकादश भाव शनि ग्रह का पक्का घर माना जाता है।

सोया हुआ ग्रह

लाल किताब कुंडली के अनुसार यदि कोई ग्रह ऐसी अवस्था में है जो किसी अन्य ग्रह को दृष्टि नहीं दे रहा तो ऐसा ग्रह सोया हुआ ग्रह कहलाता है। लेकिन यदि कोई ग्रह अपने पक्के घर में स्थित है तो वह सोया हुआ ग्रह नहीं माना जाएगा। इसका तात्पर्य यह है कि उस ग्रह का प्रभाव केवल उसी घर तक सीमित माना जाएगा जिसमें वह स्थित है इसके अतिरिक्त नहीं। उदाहरण के लिए यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में शुक्र ग्रह स्थित है और दशम भाव रिक्त है तो इस स्थिति में शुक्र सोया हुआ ग्रह माना जाएगा क्योंकि शुक्र की सप्तम दृष्टि दशम भाव पर है लेकिन उसमें कोई ग्रह स्थित नहीं है तथा चतुर्थ भाव शुक्र का पक्का घर भी नहीं है। इस स्थिति में शुक्र का प्रभाव केवल चतुर्थ भाव पर ही माना जाएगा और उसी के आधार पर फलकथन किया जाएगा।

सोया हुआ घर

लाल किताब कुंडली के जिस घर में कोई ग्रह न हो अर्थात वह घर रिक्त हो और उस घर पर किसी अन्य ग्रह की भी सामान्य दृष्टि ना हो तो ऐसा घर सोया हुआ घर कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि सोया हुआ घर तब तक स्वयं से संबंधित कोई प्रभाव नहीं देता जब तक कि उससे संबंधित उपाय कर के उसे जगाया ना जाए। प्रत्येक भाव को जगाने के विभिन्न उपाय इस प्रकार हैं:

साथी ग्रह

लाल किताब में साथी ग्रह की अवधारणा भी मानी गई है। साथी ग्रह वह ग्रह होते हैं जो एक दूसरे के पक्के घरों में बैठ जाते हैं। ऐसे ग्रह एक-दूसरे के प्रति बुरा प्रभाव नहीं देते और इसलिए साथी ग्रह बन जाते हैं और अच्छा प्रभाव देते हैं। उदाहरण के लिए शनि ग्यारहवें भाव का पक्का स्वामी है और सूर्य पांचवें भाव का पक्का स्वामी है। यदि सूर्य ग्यारहवें भाव में तथा शनि पांचवें भाव में स्थित हो जाए तो भले ही वैदिक ज्योतिष के अनुसार यह एक दूसरे के शत्रु ग्रह हों परंतु लाल किताब के अनुसार यह एक दूसरे के साथी ग्रह माने जाएंगे और एक दूसरे के घर में बुरा प्रभाव नहीं देंगे।

रतान्ध्र ग्रह या अंधा टेवा

लाल किताब के अनुसार जो ग्रह दिन में देखते हैं और रात्रि में अंधे हो जाते हैं अर्थात दृष्टि नहीं देते, ऐसे ग्रह रतान्ध्र ग्रह कहलाते हैं और जिन कुंडलियों में ऐसे ग्रह स्थित होते हैं उन्हें अंधा टेवा कहते हैं। उदाहरण के लिए यदि शनि सप्तम भाव में स्थित हो और सूर्य चतुर्थ भाव में स्थित हो तो ऐसा टेवा अंधा टेवा कहलाता है। जिस जातक का टेवा अंधा होता है उनके गृहस्थ जीवन, पारिवारिक जीवन, व्यवसायिक जीवन और मानसिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

धर्मी टेवा

जिस कुंडली में शनि और गुरु बृहस्पति का योग बनता हो तो ऐसी कुंडली धर्मी टेवा कहलाती है। ऐसी कुंडली में जातक के अशुभ ग्रहों का प्रभाव बहुत हद तक कम हो जाता है। लाल किताब के अनुसार गुरु बृहस्पति नवम तथा द्वादश भाव का स्वामी है तथा शनि दशम तथा एकादश भाव का स्वामी है। कुंडली में इन दोनों ग्रहों का सहयोग बहुत सारी समस्याओं को समाप्त कर देता है और व्यक्ति को जीवन में परेशानियों से निकालने में मददगार सिद्ध होता है। छठे, नवें, ग्यारहवें और भाव में शनि-गुरु का योग जिस कुंडली में होता है उस में विभिन्न प्रकार की अच्छाइयाँ पाई जाती हैं।

नाबालिग टेवा

लाल किताब के अनुसार जब किसी कुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम तथा दशम भाव अर्थात केंद्र भाव रिक्त हो यानी कि उनमें कोई भी ग्रह स्थिति ना हो तो ऐसा टेवा नाबालिग टेवा कहलाता है। इसके अतिरिक्त यदि केवल पापी ग्रह जैसे शनि, राहु, केतु अथवा अकेला बुध इन भावों में स्थित हो तो भी ऐसा टेवा नाबालिग टेवा कहलाता है। नाबालिग टेवा में ग्रहों का असर 12 वर्ष तक पूर्ण रुप से नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसी स्थिति में 12 वर्ष की अवस्था तक व्यक्ति को पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर ही परिणामों की प्राप्ति होती है और 12 वर्ष की समाप्ति के उपरांत ही उसका फल कथन किया जाता है। जिस व्यक्ति की कुंडली नाबालिग टेवा होती है, उस पर 12 वर्षों तक प्रतिवर्ष अलग-अलग ग्रह का प्रभाव होता है। इन प्रभावों को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है :

  • जन्म के पहले वर्ष में सप्तम भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के दूसरे वर्ष में चतुर्थ भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के तीसरे वर्ष में नवम भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के चौथे वर्ष में दशम भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के पाँचवे वर्ष में एकादश भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के छठे वर्ष में तृतीय भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के सातवें वर्ष में द्वितीय भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के आठवें वर्ष में पंचम भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के नौवें वर्ष में षष्ठम भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के दसवें वर्ष में द्वादश भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के ग्यारहवें वर्ष में प्रथम भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।
  • जन्म के बारहवें वर्ष में अष्टम भाव के ग्रह का प्रभाव होता है।

उपरोक्त ग्रहों के प्रभाव से बचने के लिए व्यक्ति को उन घरों के ग्रहों से संबंधित उपाय अवश्य करने चाहिए जिससे कि समय रहते समस्याओं से बचा जा सके।

लाल किताब के अनुसार विभिन्न प्रकार के ऋण

लाल किताब के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के रिश्तों से संबंधित ऋणों का पता चलता है। यदि हम इन ऋणों के बारे में जान सकते हैं तो उसी के अनुसार उनका उपाय करके उन कष्टों से भी बचा जा सकता है जो इन ऋणों के कारण हमारे जीवन में आते हैं। आइए अब इनके बारे में विस्तार से जानते हैं:

पितृ ऋण

लाल किताब के मुताबिक़ दूसरे, पाँचवें, नौवें या बारहवें भाव में जब शुक्र, बुध या राहु या फिर इनकी युति हो, तो जातक पर पितृ-ऋण माना जाता है। इस ऋण के कारण व्यक्ति के संचित धन का नाश होता है और जीवन में कष्टों का सामना करना पड़ता है। विशेषकर वृद्धावस्था में बुरे प्रभाव प्राप्त होते हैं।

मातृ ऋण

लाल किताब के अनुसार जब चौथे घर में केतू हो, तो चन्द्रमा पीड़ित हो जाता है। चन्द्रमा माता का कारक होता है। इस स्थिति में जातक पर मातृ ऋण माना जाता है। इस ऋण के कारण कार्यों में असफलता मिलती है और धन हानि के योग बनते हैं। साथ ही जातक और रोग तथा क़र्ज़ के बोझ तले दब जाता है।

स्त्री ऋण

लाल किताब के अनुसार जब सूर्य, चन्द्र या राहु या उनकी युति कुण्डली के दूसरे अथवा सातवें भाव में हो, तो जातक स्त्री-ऋण से ग्रसित माना जाता है। इस ऋण की वजह से व्यक्ति को अनेक प्रकार के संकटों का सामना करना पड़ता है। यदि जातक अपने घर में कोई मांगलिक कार्यक्रम आयोजित करता है तो उसमें रंग में भंग पड़ जाता है और खुशियाँ गमों में बदल जाती है।

भ्रातृ अथवा सम्बन्धी ऋण

लाल किताब के अनुसार जब बुध या शुक्र किसी कुण्डली के पहले या आठवें भाव में स्थित हों, तो उस जातक को भ्रातृ-ऋण या संबंधी-ऋण का भागी माना जाता है। इस ऋण की उपस्थिति के परिणामस्वरूप जातक संकटो में घिर जाता है और अनेक प्रकार से हानि होने के योग बनते हैं।

बहिन अथवा पुत्री ऋण

लाल किताब के मुताबिक़ बुध जब कुण्डली के तीसरे या छठे भाव में बैठा हो, तो जातक को इस ऋण का भागी माना जाता है। इस ऋण के परिणामस्वरूप जातक को अपने मित्रों तथा सगे-संबंधियों से कोई सहायता प्राप्त नहीं होती, बल्कि वह शत्रुवत व्यवहार करने लगते हैं। व्यक्ति को घर आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और जीवन में संकट आने लगते हैं।

निर्दयी ऋण

लाल किताब के अनुसार जब सूर्य, चन्द्रमा या मंगल या इनमें से किसी की युति कुण्डली के दसवें या बारहवें भाव में हो, तो जातक को इस ऋण से ग्रसित माना जाता है। इस ऋण का प्रभाव ना केवल जातक पर पड़ता है, बल्कि पूरे कुटुंब पर भी इसका प्रभाव दिखाई देता है। जीवन में अनेक प्रकार के संकट आते हैं और कोई ना कोई परेशानी बनी रहती है।

अजन्मा ऋण

लाल किताब के मुताबिक़ जब सूर्य, शुक्र या मंगल या फिर इन ग्रहों की युति कुण्डली के बारहवें भाव में हो, तो जातक इस ऋण का भागी कहलाता है। टेवे में इस ऋण की उपस्थिति जातक को शारीरिक क्षति पहुँचाती है। कई बार जातक को कारागार में जाने के योग बनते हैं। अनेक स्थानों पर हार का सामना करना पड़ता है और जातक का कुटुंब भी परेशानियों से गुजरता है।

स्व ऋण

लाल किताब के अनुसार पाँचवें भाव में जब शुक्र, शनि, राहु या केतु स्थित हों या इनमें से किसी की युति पंचम भाव में हो, तो जातक आत्म-ऋण का भागी माना जाता है। इस ऋण के कारण व्यक्ति को जीवन भर संघर्षों का सामना करना पड़ता है। उसे वाद विवाद तथा कोर्ट केसों में पराजय का सामना करना पड़ता है। वह बार-बार बिना किसी कारण अपमान होता है और कभी-कभी राजकीय दंड भी प्राप्त होता है।

दैवीय ऋण

लाल किताब के अनुसार जब चंद्रमा या मंगल कुण्डली के छठे भाव में स्थित हों, तो जातक इस ऋण से ग्रसित माना जाता है। जातक के टेवे में इस ऋण की उपस्थिति से जातक के पूरे कुटुंब को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जातक को व्यर्थ की धन हानि होती है और खर्चे बढ़ जाते हैं। जातक जिस किसी पर विश्वास करता है वही उसके साथ विश्वासघात करता है और जातक को संतान हानि अथवा संतान संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

इस प्रकार लाल किताब के अनुसार अनेक प्रकार के ऋण किसी जातक के जीवन को प्रभावित करते हैं। अतः यदि जातक इन वर्णों के उपाय कर ले तो इनसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है और जीवन में जातक ऊँचाइयों की ओर अग्रसर होता है।

लाल किताब की विशेषता यह है कि इसमें दिए गए सामान्य उपाय के द्वारा आप अपने जीवन में आने वाली अनेक प्रकार की समस्याओं का निस्तारण कर सकते हैं और जीवन में आनंद की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में लाल किताब ज्योतिष के बहुत ही महत्वपूर्ण उपाय प्रदान करती है।

हम आशा करते हैं कि लाल किताब के संबंध में दिया गया यह आलेख आपको अनेक प्रकार की समस्याओं को दूर करने में सहायक सिद्ध होगा और आप लाल किताब के उपाय अपनाकर अपने जीवन को खुशनुमा बना पाएंगे। लाल किताब के उपाय ज्योतिष विज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित हैं। अतः ज्योतिष में इस पुस्तक को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

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