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वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह

ज्योतिष में शुक्र ग्रह जन्म कुंडली में स्थित 12 भावों पर अलग-अलग तरह से प्रभाव डालता है। इन प्रभावों का असर हमारे प्रत्यक्ष जीवन पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त शुक्र एक शुभ ग्रह है, परंतु यदि शुक्र कुंडली में मजबूत होता है तो जातकों को इसके अच्छे परिणाम मिलते हैं जबकि कमज़ोर होने पर यह अशुभ फल देता है। आइए विस्तार से जानते हैं शुक्र ग्रह के विभिन्न भावों पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है -

वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह का प्रत्येक भाव में प्रभाव

शुक्र प्रथम भाव में शुक्र द्वितीय भाव में शुक्र तृतीय भाव में शुक्र चतुर्थ भाव में
शुक्र पंचम भाव में शुक्र छठें भाव में शुक्र सप्तम भाव में शुक्र अष्टम भाव में
शुक्र नवम भाव में शुक्र दशम भाव में शुक्र एकादश भाव में शुक्र द्वादश भाव में

ज्योतिष में शुक्र ग्रह का महत्व

शुक्र को वैदिक ज्योतिष में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह को एक शुभ ग्रह माना गया है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को भौतिक, शारीरिक और वैवाहिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसलिए ज्योतिष में शुक्र ग्रह को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शौहरत, कला, प्रतिभा, सौन्दर्य, रोमांस, काम-वासना और फैशन-डिजाइनिंग आदि का कारक माना जाता है। शुक्र वृषभ और तुला राशि का स्वामी होता है और मीन इसकी उच्च राशि है, जबकि कन्या इसकी नीच राशि कहलाती है। शुक्र को 27 नक्षत्रों में से भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त है। ग्रहों में बुध और शनि ग्रह शुक्र के मित्र ग्रह हैं और तथा सूर्य और चंद्रमा इसके शत्रु ग्रह माने जाते हैं। शुक्र का गोचर 23 दिन की अवधि का होता है अर्थात सूर्य एक राशि में क़रीब 23 दिन तक रहता है।

ज्योतिष के अनुसार शुक्र ग्रह का मनुष्य जीवन पर प्रभाव

शारीरिक रूपरेखा एवं स्वभाव - हिन्दू ज्योतिष में शुक्र ग्रह जिस व्यक्ति के लग्न भाव में होता है वह जातक रूप-रंग से सुंदर होता है। उसका व्यक्तित्व विपरीत लिंग के व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है। शुक्र के प्रभाव से वह दीर्घायु होता है और स्वभाव से वह मृदुभाषी होता है। लग्न में शुक्र व्यक्ति को गायन, वादन, नृत्य, चित्र कला के प्रति रूचि पैदा कराता है। शुक्र के प्रभाव से व्यक्ति काम-वासना, भोग विलास संबंधी चीज़ों को अधिक प्राथमिकता देता है। जिस जातक की कुंडली में शुक्र प्रथम भाव में स्थित होता है वह चित्रकार, गायक, नर्तक, कलाकार, अभिनेता आदि बनता है।

बली शुक्र - बली शुक्र व्यक्ति के वैवाहिक जीवन को सुखी बनाता है। यह पति-पत्नी के बीच प्रेम की भावना को बढ़ाता है। वहीं प्रेम करने वाले जातकों के जीवन में रोमांस में वृद्धि करता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में शुक्र मजबूत स्थिति में होता है वह व्यक्ति जीवन में भौतिक सुखों का आनंद लेता है। बली शुक्र के कारण व्यक्ति साहित्य एवं कला में रुचि लेता है।

पीड़ित शुक्र - पीड़ित शुक्र के कारण व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में परेशानियाँ आती हैं। पती-पत्नि के बीच मतभेद होते हैं। व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता आती है और वह भौतिक सुखों के अभाव में जीता है। यदि जन्म कुंडली में शुक्र कमज़ोर होता है तो जातक को कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। पीड़ित शुक्र के प्रभाव से बचने के लिए जातकों को शुक्र ग्रह के उपाय करने चाहिए।

रोग - कमज़ोर शुक्र के कारण जातक की कामुक शक्ति कमज़ोर होती है। इसके प्रभाव से व्यक्तियों को किडनी से संबंधित बीमारी होने का ख़तरा रहता है। व्यक्ति को आँखों से सबंधित वहीं स्त्री जातकों के लिए शुक्र गर्भपात का कारण बनता है।

कार्यक्षेत्र - ज्योतिष में शुक्र ग्रह कोरियोग्राफी, संगीतकार, पेंटर, फैशन, डिज़ाइनिंग, इवेंट मैनेजमेंट, कपड़ा संबंधी व्यवसाय, होटल, रेस्ट्रोरेंट, टूर एंड ट्रेवल, थिएटर, साहित्यकार, फिल्म इंडस्ट्री आदि कार्यक्षेत्र को दर्शाता है।

उत्पाद - ज्योतिष में शुक्र ग्रह सौन्दर्य उत्पाद, विद्युत उत्पाद, फैन्सी प्रोडक्ट्स, इत्र, कन्फेक्शनरी, फूल, चीनी, कार, शिप, हवाई जहाज़, पेट्रोल आदि वस्तुओं को दर्शाता है।

स्थान - शयन कक्ष, सिनेमा, बगीचा, बैंकेट हॉल, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री, बंदरगाह, हवाई हड्डा, खादानें, देह व्यापार क्षेत्र आदि

जानवर व पक्षी - बकरी, बैल, बत्तक, चिड़िया, तेंदुआ आदि।

जड़ी - अरंड मूल

रत्न - हीरा

रुद्राक्ष - छः मुखी रुद्राक्ष

रंग - गुलाबी।

यंत्र - शुक्र यंत्र

शुक्र ग्रह के मंत्र -

शुक्र का वैदिक मंत्र
ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।


शुक्र का तांत्रिक मंत्र
ॐ शुं शुक्राय नमः

शुक्र का बीज मंत्र
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

धार्मिक दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व

पौराणिक मान्यता के अनुसार, शुक्र ग्रह असुरों के गुरू हैं इसलिए इन्हें शुक्राचार्य भी कहा जाता है। भागवत पुराण में लिखा गया है कि शुक्र महर्षि भृगु ऋषि के पुत्र हैं और बचपन में इन्हें कवि या भार्गव नाम से भी जाना जाता था। शास्त्रों में शुक्र देव के रूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है - शुक्र श्वेत वर्ण के हैं और ऊँट, घोड़े या मगरमच्छ पर सवार होते हैं। इनके हाथों में दण्ड, कमल, माला और धनुष-बाण भी है। शुक्र ग्रह का संबंध धन की देवी माँ लक्ष्मी जी से है, इसलिए हिन्दू धर्म के अनुयायी धन-वैभव और ऐश्वर्य की कामना के लिए शुक्रवार के दिन व्रत धारण करते हैं।

खगोलीय दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व

खगोल विज्ञान के अनुसार, शुक्र एक चमकीला ग्रह है। अंग्रेज़ी में इसे वीनस के नाम से जाना जाता है। यह एक स्थलीय ग्रह है। शुक्र आकार तथा दूरी में पृथ्वी के निकटतम है। कई बार इसे पृथ्वी की बहन भी कहते हैं। इस ग्रह के वायु मंडल में सर्वाधिक कार्बन डाई ऑक्साइड गैस भरी हुई है। इस ग्रह से संबंधित दिलचस्प बात यह है कि शुक्र सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद केवल थोड़ी देर के लिए सबसे तेज़ चमकता है। इसी कारण इसे भोर का तारा या सांझ का तारा कहा जाता है।

इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि खगोलीय और धार्मिक दृष्टि के साथ साथ ज्योतिष में शुक्र ग्रह का महत्व कितना व्यापक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में स्थित 12 भाव उसके संपूर्ण जीवन को दर्शाते हैं और जब उन पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है तो व्यक्ति के जीवन में उसका असर भी दिखाई देता है।

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